किशनगंज रेलवे स्टेशन पूर्वोत्तर भारत की ओर जाने वाले यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण रेल केंद्र है। इसे नॉर्थ ईस्ट के प्रवेश द्वार के रूप में भी जाना जाता है। यहां से बड़ी संख्या में यात्री अलग-अलग स्थानों के लिए रेल यात्रा करते हैं। इसके अलावा, स्टेशन के माल गोदाम के माध्यम से सीमेंट और खाद जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी की जाती है। इन सामानों की ढुलाई स्थानीय व्यापार और कृषि संबंधी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन लोडिंग-अनलोडिंग के दौरान उड़ने वाली धूल अब लोगों की चिंता का कारण बन रही है।

स्थानीय लोगों की शिकायत है कि जब मालगाड़ियों से सीमेंट और खाद उतारी जाती है या उन्हें दूसरी जगह भेजने के लिए लोड किया जाता है, तो बड़ी मात्रा में धूल आसपास फैल जाती है। हवा के साथ यह धूल स्टेशन परिसर और प्लेटफॉर्म तक पहुंचती है। ऐसे में यात्रियों को ट्रेन का इंतजार करते समय असुविधा होती है। खासकर उन लोगों को अधिक परेशानी हो सकती है, जिन्हें लंबे समय तक स्टेशन परिसर में रहना पड़ता है।
माल गोदाम के आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी यह समस्या चिंता का विषय बनी हुई है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि माल की आवाजाही और लोडिंग-अनलोडिंग की गतिविधियों के दौरान उड़ने वाली धूल से आसपास का वातावरण प्रभावित होता है। लोगों को आशंका है कि लगातार धूल के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। हालांकि, धूल के कारण होने वाले वास्तविक स्वास्थ्य प्रभावों का आकलन संबंधित विशेषज्ञों और जांच के आधार पर ही किया जा सकता है।
लोगों की मांग है कि रेलवे प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए धूल पर नियंत्रण के लिए प्रभावी उपाय करे। इसके साथ ही माल गोदाम की मौजूदा स्थिति की समीक्षा की जाए, ताकि यात्रियों और आसपास के निवासियों को राहत मिल सके। स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जब स्टेशन पर यात्री सुविधाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया जाता है, तो माल गोदाम से जुड़ी पर्यावरणीय और सुरक्षा संबंधी समस्याओं का स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा है।
इसी मुद्दे को लेकर किशनगंज के सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद ने रेलवे रैक प्वाइंट को शहर से बाहर स्थापित करने की मांग की है। उनका मानना है कि शहर के बीच स्थित माल गोदाम से होने वाली परेशानियों को कम करने के लिए इसके स्थानांतरण के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सांसद ने कहा कि यह समस्या पहले भी उठाई जा चुकी है, लेकिन अब तक इसका ठोस समाधान सामने नहीं आया है।
सांसद जावेद आजाद के मुताबिक, उन्होंने पहले भी इस विषय को संबंधित स्तर पर उठाया था। इसके बाद मंत्रालय की ओर से अधिकारियों को भेजकर संभावित रैक प्वाइंट के लिए जमीन की उपलब्धता का आकलन कराया गया था। सांसद ने बताया कि उस समय जिले में रेलवे रैक प्वाइंट के निर्माण के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई थी। जमीन की उपलब्धता को लेकर सामने आई यह स्थिति नए रैक प्वाइंट के निर्माण की दिशा में एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

हालांकि, सांसद ने जमीन की कमी से जुड़े तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सड़क निर्माण जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहित की जा सकती है, तो रेलवे के डिपो या रैक प्वाइंट के निर्माण के लिए भी इस विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि जरूरत पड़ने पर नियमानुसार भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है और संबंधित जमीन मालिकों को निर्धारित नियमों के अनुसार मुआवजा दिया जा सकता है।
सांसद के इस बयान के बाद रैक प्वाइंट के स्थानांतरण को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, किसी नए स्थान पर रैक प्वाइंट बनाने के लिए जमीन की उपलब्धता, रेल संपर्क, मालगाड़ियों की आवाजाही, परिवहन सुविधाओं और निर्माण लागत जैसे पहलुओं का आकलन करना जरूरी होगा। इसके अलावा, परियोजना को लागू करने के लिए संबंधित विभागों के बीच समन्वय और आवश्यक प्रशासनिक मंजूरी भी महत्वपूर्ण होगी।
डॉ. मोहम्मद जावेद आजाद ने स्पष्ट किया है कि वह इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे और रेलवे रैक प्वाइंट को शहर से बाहर स्थानांतरित करने की मांग रखेंगे। उनका कहना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान तलाशना जरूरी है, ताकि माल ढुलाई की गतिविधियां भी प्रभावित न हों और यात्रियों तथा स्थानीय लोगों को होने वाली परेशानी भी कम की जा सके।
इस मामले में रेलवे प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जब तक रैक प्वाइंट को शहर से बाहर स्थानांतरित करने को लेकर कोई निर्णय नहीं होता, तब तक मौजूदा माल गोदाम में धूल नियंत्रण के उपायों पर विचार किया जा सकता है। लोडिंग-अनलोडिंग के दौरान उचित प्रबंधन, नियमित सफाई और जरूरत के अनुसार धूल कम करने वाली तकनीकों का इस्तेमाल राहत देने में मददगार हो सकता है। इन उपायों की व्यवहार्यता और प्रभावशीलता का निर्धारण संबंधित तकनीकी आकलन के आधार पर किया जाना चाहिए।
किशनगंज जैसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सुविधा के साथ-साथ माल ढुलाई की व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना भी आवश्यक है। सीमेंट और खाद की आपूर्ति से जुड़ी गतिविधियां जारी रहना जरूरी है, लेकिन उनके संचालन के दौरान आसपास के लोगों की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में रेलवे प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह माल परिवहन की जरूरतों और स्थानीय नागरिकों की परेशानियों के बीच संतुलन स्थापित करे।
फिलहाल, सांसद जावेद आजाद ने इस मुद्दे को सदन में उठाने की बात कही है। अब देखना होगा कि रेलवे प्रशासन और संबंधित मंत्रालय इस मांग पर क्या कदम उठाते हैं। क्या किशनगंज शहर से बाहर नया रेलवे रैक प्वाइंट बनाने के लिए जमीन उपलब्ध कराने की दिशा में पहल होगी, या फिर मौजूदा माल गोदाम में ही धूल नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाएंगे, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि उनकी परेशानी का जल्द समाधान निकलेगा और रेलवे स्टेशन के आसपास का वातावरण बेहतर बनाने के लिए ठोस कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, किशनगंज रेलवे स्टेशन के माल गोदाम से उड़ने वाली धूल का मुद्दा यात्रियों की सुविधा, स्थानीय लोगों की चिंता और रेलवे की माल ढुलाई व्यवस्था से जुड़ा एक अहम विषय बना हुआ है।










