कटिहार बाढ़: कटिहार में बाढ़ का असर अब सिर्फ लोगों के घरों और खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है। जिले के बरारी प्रखंड में बाढ़ के पानी ने एक स्कूल का रास्ता पूरी तरह से जलमग्न कर दिया है। हालात ऐसे हैं कि स्कूल जाने के लिए बच्चों को रोज नाव का सहारा लेना पड़ रहा है। सुबह-सुबह बच्चे अपनी किताबें और स्कूल बैग लेकर नाव पर सवार होते हैं और पानी के बीच से होकर विद्यालय पहुंचते हैं। वहीं छुट्टी के बाद इसी नाव से उन्हें वापस घर लौटना पड़ता है।
मामला बरारी प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय प्रतापगंज का है। कोसी और बरंडी नदी के जलस्तर में लगातार बढ़ोतरी के कारण स्कूल के चारों तरफ पानी जमा हो गया है। विद्यालय तक पहुंचने वाला सामान्य रास्ता पूरी तरह पानी में डूब चुका है। सड़क पर कई जगह तेज बहाव होने के कारण पैदल या किसी अन्य साधन से स्कूल तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए नाव ही फिलहाल एकमात्र रास्ता बन गई है।

स्कूल के शिक्षकों के मुताबिक, बाढ़ के कारण जब विद्यालय तक पहुंचने का रास्ता बंद हुआ, तब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए निजी नाव की व्यवस्था की गई। इस नाव के जरिए आसपास के बच्चे स्कूल तक पहुंच रहे हैं। नाविक को प्रतिदिन करीब 500 रुपये का भुगतान किया जाता है। रोजाना बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं इस नाव से विद्यालय पहुंचते हैं।
बताया जा रहा है कि सामान्य दिनों में 100 से ज्यादा बच्चे नाव के जरिए स्कूल पहुंचते हैं। वहीं नाविक के अनुसार कई दिनों में बच्चों की संख्या बढ़कर 150 से 200 तक भी पहुंच जाती है। यानी बाढ़ के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए स्कूल जाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि बच्चों का इस तरह नाव से स्कूल जाना अपने आप में एक बड़ी चिंता का विषय है। कोसी और बरंडी जैसी नदियों का पानी बढ़ने के दौरान बहाव काफी तेज हो सकता है। ऐसे में छोटे बच्चों को नाव के जरिए स्कूल भेजना अभिभावकों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। उन्हें हर दिन इस बात की चिंता रहती है कि उनके बच्चे सुरक्षित स्कूल पहुंचेंगे या नहीं और फिर सही-सलामत घर लौटेंगे या नहीं।
बाढ़ के पानी के बीच नाव से सफर करने वाले बच्चों की तस्वीरें और हालात यह दिखाते हैं कि प्राकृतिक आपदा का सबसे ज्यादा असर अक्सर उन सुविधाओं पर पड़ता है, जिन्हें सामान्य दिनों में लोग सहज मानते हैं। स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क और रास्ते मौजूद हैं, लेकिन पानी बढ़ते ही वही रास्ते बच्चों के लिए बंद हो गए। ऐसे में शिक्षा जारी रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ रही है।

अभिभावकों की चिंता भी लगातार बढ़ रही है। उनका कहना है कि हाल के दिनों में डूबने की घटनाओं की खबरों ने डर और बढ़ा दिया है। बच्चों की उम्र कम है और उन्हें तेज बहाव वाले पानी के बीच नाव से स्कूल भेजना जोखिम भरा हो सकता है। माता-पिता चाहते हैं कि प्रशासन सिर्फ अस्थायी नाव की व्यवस्था तक सीमित न रहे, बल्कि इस समस्या का स्थायी समाधान भी निकाला जाए।
स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी मांग पुल के निर्माण की है। उनका कहना है कि अगर स्कूल और आसपास के इलाकों को जोड़ने के लिए मजबूत पुल या सुरक्षित संपर्क मार्ग बनाया जाए, तो बाढ़ के समय बच्चों को नाव पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। बरसात और बाढ़ के मौसम में हर साल रास्ते डूबने की समस्या सामने आती है। ऐसे में स्थायी कनेक्टिविटी से बच्चों के साथ-साथ ग्रामीणों को भी राहत मिल सकती है।
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद जिला शिक्षा विभाग भी सक्रिय हुआ है। जिला शिक्षा पदाधिकारी राहुल चंद्र चौधरी ने मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। विभाग ने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करने की बात कही है।

जिला शिक्षा पदाधिकारी के मुताबिक, जब तक बाढ़ का पानी कम नहीं हो जाता, तब तक बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए उत्क्रमित मध्य विद्यालय प्रतापगंज को अनारकली विद्यालय में शिफ्ट किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि बच्चों को बाढ़ के पानी के बीच नाव से स्कूल जाने की जरूरत न पड़े और उनकी पढ़ाई भी जारी रहे।
यह फैसला बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्योंकि शिक्षा जरूरी है, लेकिन बच्चों की जान और सुरक्षा उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। बाढ़ की स्थिति में स्कूल को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने से बच्चों और अभिभावकों दोनों की चिंता कम हो सकती है।
कटिहार सहित बिहार के कई इलाकों में हर साल बाढ़ का असर देखने को मिलता है। नदियों का जलस्तर बढ़ने के बाद गांवों की सड़कें, खेत और संपर्क मार्ग पानी में डूब जाते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है। बच्चों की शिक्षा भी इससे प्रभावित होती है। कहीं स्कूल तक पहुंचने का रास्ता बंद हो जाता है, तो कहीं स्कूल भवन के आसपास पानी जमा होने से पढ़ाई रोकनी पड़ती है।

प्रतापगंज का मामला इस बात की तस्वीर सामने रखता है कि बाढ़ के दौरान ग्रामीण इलाकों में बच्चों की शिक्षा जारी रखना कितनी बड़ी चुनौती बन जाता है। बच्चे पढ़ना चाहते हैं, शिक्षक स्कूल में मौजूद हैं, लेकिन स्कूल तक पहुंचने का रास्ता ही पानी में डूब गया है। ऐसे में नाव के सहारे पढ़ाई जारी रखने की कोशिश की जा रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल बच्चों की सुरक्षा का है। प्रशासन की ओर से स्कूल को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में उम्मीद है कि बच्चों को जल्द ही बाढ़ के पानी के बीच से होकर स्कूल जाने की मजबूरी से राहत मिलेगी।
फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में लोगों की सुरक्षा और जरूरी सेवाओं को बनाए रखना है। शिक्षा विभाग की ओर से भी स्थिति पर नजर रखी जा रही है। आने वाले दिनों में जलस्तर कम होने के बाद स्कूल को दोबारा अपने स्थान पर संचालित करने को लेकर फैसला लिया जा सकता है।
कटिहार के प्रतापगंज की यह तस्वीर सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा किस तरह बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी और उनकी पढ़ाई को प्रभावित करती है। जिन बच्चों के हाथों में किताबें और कॉपियां होनी चाहिए, उन्हें फिलहाल नाव के सफर से होकर स्कूल पहुंचना पड़ रहा है। अब प्रशासन के सामने चुनौती यही है कि बच्चों की पढ़ाई भी जारी रहे और उनकी सुरक्षा से किसी तरह का समझौता भी न हो।










