टुल्ली देवी के परिवार में चार सदस्य हैं। घर चलाने और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए वह नदी के दूसरी ओर जाती हैं, जहां से लकड़ियां, घास और बांस जैसी चीजें जुटाती हैं। इसके बाद इन सामानों को लेकर उन्हें वापस अपने गांव लौटना पड़ता है। नदी पार करने का यह सफर कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार उन्हें गले तक गहरे पानी से होकर गुजरना पड़ता है। सिर पर वजन और पैरों के नीचे पानी की तेज धारा के बीच संतुलन बनाए रखना उनके लिए बेहद मुश्किल होता है।
यह कोई एक दिन की घटना नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। जिस रास्ते से आम तौर पर लोग सुरक्षित आवागमन की उम्मीद करते हैं, उसी रास्ते पर टुल्ली देवी को हर दिन अपनी सुरक्षा से समझौता करना पड़ता है। उनके सामने परिवार की जिम्मेदारी है और उसे पूरा करने के लिए काम करना जरूरी है। ऐसे में जोखिम का एहसास होने के बावजूद वह पीछे नहीं हट सकतीं।

जब टुल्ली देवी से पूछा जाता है कि इतनी गहरी नदी पार करते समय उन्हें डर नहीं लगता, तो उनका जवाब उनकी मजबूरी को बयां कर देता है। उनका कहना है कि अगर वह डरकर घर बैठ जाएंगी, तो बच्चों का पेट कौन भरेगा और घर में खाना कैसे बनेगा? यह सवाल केवल एक महिला की परेशानी नहीं है, बल्कि उन परिवारों की स्थिति को भी सामने लाता है, जिनके पास रोजगार के सीमित साधन हैं और जिनकी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए सुरक्षित रास्ते तक उपलब्ध नहीं हैं।
टुल्ली देवी की कहानी में मेहनत और हिम्मत तो दिखाई देती है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता है कि आखिर कब तक लोगों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इस तरह का जोखिम उठाना पड़ेगा। किसी भी परिवार के लिए भोजन, रोजगार और सुरक्षित आवागमन बेहद जरूरी हैं। लेकिन जब रोजगार तक पहुंचने या जरूरी संसाधन जुटाने के लिए जान जोखिम में डालनी पड़े, तो यह समस्या केवल व्यक्तिगत संघर्ष तक सीमित नहीं रहती। यह पूरे क्षेत्र की बुनियादी जरूरतों से जुड़ा सवाल बन जाती है।
भंकरद्वारी गांव और आसपास के इलाकों में महानंदा नदी पर पुल नहीं होने से ग्रामीणों को लंबे समय से आवागमन की परेशानी झेलनी पड़ रही है। नदी के कारण लोगों का संपर्क आसपास के प्रमुख स्थानों से प्रभावित होता है। ग्रामीणों के मुताबिक, किशनगंज शहर और एमजीएम मेडिकल कॉलेज पहुंचने के लिए उन्हें ठाकुरगंज या पोवाखाली की ओर से लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इस वजह से जिला मुख्यालय तक पहुंचने के लिए करीब 70 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि महानंदा नदी पर पुल बनकर तैयार हो जाए, तो यह दूरी घटकर लगभग 15 किलोमीटर रह सकती है। इससे न केवल आने-जाने में लगने वाला समय कम होगा, बल्कि लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और बाजार तक पहुंचने में भी सुविधा मिल सकती है। खासकर आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पहुंचना आसान हो सकता है। फिलहाल, पुल के अभाव में ग्रामीणों को लंबा रास्ता चुनना पड़ता है या फिर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जोखिम भरे विकल्पों का सहारा लेना पड़ता है।

किसी भी इलाके में सड़क और पुल केवल आवागमन के साधन नहीं होते, बल्कि वे स्थानीय विकास की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। सुरक्षित संपर्क मार्ग होने से किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने, मजदूरों को काम पर जाने, विद्यार्थियों को स्कूल-कॉलेज पहुंचने और मरीजों को अस्पताल ले जाने में मदद मिलती है। इसके विपरीत, जब नदी पर पुल नहीं होता या निर्माण अधूरा रह जाता है, तो उसका असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है।
भंकरद्वारी गांव के ग्रामीण भी लंबे समय से इसी परेशानी से जूझ रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से करीब तीन साल पहले महानंदा नदी पर पुल निर्माण का काम शुरू किया गया था। इससे ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि अब उनकी वर्षों पुरानी परेशानी खत्म होगी और उन्हें सुरक्षित आवागमन का रास्ता मिल सकेगा। लोगों को लगा था कि पुल बन जाने के बाद नदी पार करने के लिए जान जोखिम में डालने की मजबूरी खत्म हो जाएगी।
लेकिन निर्माण कार्य अब तक अधूरा रहने के कारण ग्रामीणों की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकी हैं। पुल कब तक तैयार होगा और लोगों को इसका लाभ कब मिलेगा, यह सवाल अब भी बना हुआ है। दूसरी ओर, टुल्ली देवी जैसी महिलाओं के लिए रोजी-रोटी की जरूरत हर दिन सामने खड़ी होती है। पुल के पूरा होने का इंतजार अपनी जगह है, लेकिन परिवार का पेट भरने के लिए उन्हें आज भी नदी पार करनी पड़ती है।
यहां सवाल केवल निर्माण कार्य के अधूरे रहने का नहीं है, बल्कि उन लोगों की सुरक्षा का भी है, जिन्हें इस समस्या का सीधा सामना करना पड़ता है। गहरे पानी में सिर पर भारी सामान लेकर नदी पार करना किसी भी समय दुर्घटना का कारण बन सकता है। पानी का स्तर बढ़ने, बहाव तेज होने या संतुलन बिगड़ने की स्थिति में जान का खतरा और बढ़ जाता है। ऐसे में सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था होना ग्रामीणों की एक महत्वपूर्ण जरूरत है।
टुल्ली देवी का संघर्ष हमें यह भी याद दिलाता है कि विकास का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका लाभ आम लोगों तक पहुंचे। किसी गांव में पुल, सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता वहां रहने वाले परिवारों की जिंदगी को आसान बना सकती है। लेकिन जब ऐसी सुविधाओं का इंतजार वर्षों तक जारी रहता है, तो सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को होती है, जिनके पास दूसरे विकल्प नहीं होते।
अब जरूरत है कि महानंदा नदी पर अधूरे पड़े पुल के निर्माण की स्थिति स्पष्ट की जाए और काम पूरा करने की समयसीमा के बारे में ग्रामीणों को जानकारी मिले। साथ ही, जब तक पुल तैयार नहीं हो जाता, तब तक लोगों को नदी पार करने के दौरान होने वाले खतरों से बचाने के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी है।
किशनगंज के भंकरद्वारी गांव की यह कहानी सिर्फ टुल्ली देवी की नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण परिवारों की परेशानी को सामने लाती है, जो बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। एक तरफ परिवार की जिम्मेदारियां हैं, तो दूसरी तरफ नदी का गहरा पानी और अधूरे पुल की समस्या।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि महानंदा नदी पर पुल का निर्माण आखिर कब पूरा होगा? कब टुल्ली देवी जैसी महिलाओं को रोजी-रोटी के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ेगी? और कब भंकरद्वारी गांव के लोगों को किशनगंज शहर और अस्पताल तक पहुंचने के लिए लंबा रास्ता तय करने की मजबूरी से राहत मिलेगी?
इन सवालों के जवाब और पुल का निर्माण पूरा होने का इंतजार आज भी ग्रामीणों को है। फिलहाल, टुल्ली देवी की रोजमर्रा की जिंदगी यही बता रही है कि सुरक्षित आवागमन केवल सुविधा नहीं, बल्कि जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए अधूरे पुल का निर्माण पूरा होना और ग्रामीणों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराना बेहद अहम है।










