पप्पू यादव ने यहां तक कहा कि वे खुद भी सांसद पद से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं। दोनों नेता हिंदी भाषी राज्यों में किसी भी सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत साबित कर सकते हैं। उन्होंने इस मुकाबले के लिए पटना को भी संभावित चुनावी मैदान बताया।

दरअसल, इस राजनीतिक बयानबाजी की शुरुआत 4 नवंबर को हुई थी। उस दिन असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा पूर्णिया पहुंचे थे। अपने दौरे के दौरान उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कांग्रेस के एसआईआर विरोध को लेकर निशाना साधा था। इसी दौरान उन्होंने पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को भी सांसद पद से इस्तीफा देने की सलाह दी थी।
हिमंत बिस्वा शर्मा के इसी बयान पर अब पप्पू यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने असम के मुख्यमंत्री के राजनीतिक सफर पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे कांग्रेस की कोख से जन्मे हैं। पप्पू यादव ने तंज कसते हुए कहा, ”जो मां का नहीं हुआ, वह किसका होगा?” इस बयान के जरिए उन्होंने हिमंत बिस्वा शर्मा के कांग्रेस से भाजपा में आने के राजनीतिक सफर पर निशाना साधा।
पप्पू यादव ने कहा कि राजनीतिक ताकत का असली परीक्षण पार्टी के संगठन, चुनाव चिह्न और बड़े नेताओं के समर्थन से अलग होकर होना चाहिए। उनका कहना था कि अगर हिमंत बिस्वा शर्मा वास्तव में अपनी लोकप्रियता और जनसमर्थन को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें भाजपा और आरएसएस के सहयोग के बिना चुनाव लड़कर दिखाना चाहिए।
उन्होंने अपनी ओर से भी चुनावी चुनौती स्वीकार करने की बात कही। पप्पू यादव के मुताबिक, वे सांसद पद से इस्तीफा देने को तैयार हैं और दोनों नेता निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में आमने-सामने चुनाव लड़ सकते हैं। उन्होंने इसके लिए हिंदी भाषी राज्यों में किसी भी चुनाव क्षेत्र को चुनने की बात कही और पटना का नाम भी सामने रखा।

इस बयान के बाद राजनीतिक चर्चा का एक बड़ा मुद्दा यह बन गया है कि क्या यह चुनौती केवल जुबानी राजनीतिक हमला है या आने वाले दिनों में इसे किसी ठोस चुनावी चुनौती में बदला जाएगा। हालांकि, फिलहाल दोनों नेताओं के बीच निर्दलीय चुनाव लड़ने को लेकर किसी औपचारिक प्रक्रिया या सहमति की जानकारी सामने नहीं आई है। पप्पू यादव ने अपनी बात सार्वजनिक बयान के माध्यम से रखी है।
पप्पू यादव ने इस दौरान केवल हिमंत बिस्वा शर्मा को ही निशाने पर नहीं लिया, बल्कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के जनाधार पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि बिहार में भाजपा की राजनीतिक ताकत जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू के समर्थन पर निर्भर है। उनका कहना है कि जदयू का साथ नहीं होने पर भाजपा के लिए अपनी सभाओं में बड़ी संख्या में लोगों को जुटाना मुश्किल हो सकता है।
अपने इस दावे को मजबूत करने के लिए पप्पू यादव ने साहिबगंज और भागलपुर में भाजपा नेताओं की सभाओं का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि इन सभाओं में 100 से 300 कुर्सियां तक नहीं भर सकीं। हालांकि, यह आंकड़े पप्पू यादव की ओर से किए गए दावे हैं। इन सभाओं में वास्तविक उपस्थिति और आयोजन से जुड़ी परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि इस जानकारी में उपलब्ध नहीं है।
पप्पू यादव ने अपने छात्र और युवा संगठनों की ताकत का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उनके संगठन का एक छोटा सा कार्यकर्ता भी 200 मोटरसाइकिलों का काफिला जुटाने की क्षमता रखता है। उन्होंने अपने इस दावे को लेकर भी बड़ा बयान दिया और कहा कि अगर वे ऐसा नहीं कर पाए, तो राजनीति छोड़ने के लिए भी तैयार हैं।
उनके इस बयान को बिहार की राजनीति में अपने संगठनात्मक प्रभाव और समर्थकों की संख्या दिखाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पप्पू यादव ने एक तरफ हिमंत बिस्वा शर्मा को निर्दलीय चुनाव लड़ने की चुनौती दी, तो दूसरी तरफ भाजपा के जनाधार और चुनावी सभाओं में जुटने वाली भीड़ को लेकर भी सवाल खड़े किए।

राजनीतिक रूप से यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें बिहार और असम, दोनों राज्यों की राजनीति का जिक्र शामिल है। एक तरफ असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा हैं, जो भाजपा के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव हैं, जो अपने बयानों और राजनीतिक सक्रियता को लेकर अक्सर चर्चा में रहते हैं।
इस पूरे विवाद में कांग्रेस का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। हिमंत बिस्वा शर्मा पहले कांग्रेस में रहे हैं और बाद में भाजपा में शामिल हुए थे। पप्पू यादव ने इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर उन पर निशाना साधा। उनके बयान में कांग्रेस से भाजपा तक के राजनीतिक सफर को लेकर तंज साफ तौर पर दिखाई दिया।
वहीं, हिमंत बिस्वा शर्मा की ओर से पप्पू यादव की इस नई चुनौती पर क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर भी राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी। क्या असम के मुख्यमंत्री इस चुनौती का जवाब देंगे या यह विवाद केवल बयानों तक सीमित रहेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना साफ है कि पूर्णिया से शुरू हुई राजनीतिक बयानबाजी अब भाजपा के जनाधार, जदयू के साथ उसके गठबंधन और नेताओं की व्यक्तिगत चुनावी ताकत तक पहुंच गई है। पप्पू यादव ने निर्दलीय चुनाव की चुनौती देकर राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है। अब देखना होगा कि हिमंत बिस्वा शर्मा इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और बिहार की राजनीति में इस बयान का आगे क्या असर देखने को मिलता है।
फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों और समर्थकों की नजर बनी हुई है।









