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भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया: भट्टा दुर्गा बाड़ी में एक लाख बांस से बना भव्य पंडाल, 110 साल पुरानी बंगाली परंपरा आज भी कायम

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भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया:  शारदीय नवरात्र का पर्व हो और मां दुर्गा की भक्ति की बात न हो, ऐसा संभव नहीं है। नवरात्र के दिनों में देशभर में मां दुर्गा की आराधना की जाती है। जगह-जगह भव्य पूजा पंडाल सजाए जाते हैं, मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ पूजा-अर्चना में शामिल होते हैं। लेकिन बिहार के पूर्णिया में एक ऐसा दुर्गा पूजा स्थल है, जहां आस्था के साथ-साथ इतिहास, बंगाली संस्कृति और अद्भुत शिल्पकला का अनूठा संगम देखने को मिलता है। हम बात कर रहे हैं पूर्णिया शहर की प्रसिद्ध भट्टा दुर्गा बाड़ी की, जहां करीब 110 वर्षों से बंगाली परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जा रही है। इस वर्ष यहां पूजा का 111वां आयोजन किया जा रहा है। खास बात यह है कि इस बार श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के लिए करीब एक लाख बांस से त्रिपुरा आर्ट शैली में एक विशाल और भव्य पंडाल तैयार किया गया है।

पूर्णिया की भट्टा दुर्गा बाड़ी में शारदीय नवरात्र के दौरान भक्तिमय माहौल देखने को मिलता है। मां दुर्गा के जयकारों, धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा की तैयारियों के बीच पूरा परिसर श्रद्धा और उत्साह से सराबोर नजर आता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत है, जो पीढ़ियों से लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है। समय के साथ शहर का स्वरूप बदला, नई पीढ़ियां आईं और पूजा के आयोजन में कई बदलाव हुए, लेकिन भट्टा दुर्गा बाड़ी में बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा करने की परंपरा आज भी कायम है।

इस पूजा का इतिहास वर्ष 1916 से जुड़ा हुआ है। इसी वर्ष भट्टा दुर्गा बाड़ी में पहली बार मां दुर्गा की पूजा शुरू की गई थी। तब से लेकर आज तक यहां हर साल शारदीय नवरात्र के अवसर पर मां दुर्गा की आराधना की जाती है। लंबे समय से चले आ रहे इस आयोजन ने पूर्णिया के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में अपनी एक खास पहचान बनाई है। बंगाली परंपराओं के अनुसार पूजा संपन्न कराने की व्यवस्था इसे शहर के अन्य पूजा स्थलों से अलग बनाती है। यहां धार्मिक विधि-विधानों के साथ-साथ उन परंपराओं का भी ध्यान रखा जाता है, जो बंगाली समाज में दुर्गा पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती हैं।

इस बार भट्टा दुर्गा बाड़ी का पूजा पंडाल विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पंडाल को त्रिपुरा आर्ट शैली में तैयार किया गया है। इसकी भव्यता और बनावट को देखते हुए इसे तैयार करने में बड़ी संख्या में बांस का इस्तेमाल किया गया है। जानकारी के मुताबिक, पंडाल के निर्माण में करीब एक लाख बांस लगाए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में बांस का इस्तेमाल कर तैयार की गई संरचना इस आयोजन को खास बनाती है। पंडाल की बनावट में कारीगरों की मेहनत, पारंपरिक शिल्पकला और रचनात्मकता की झलक देखने को मिलती है।

भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया
भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया

पूजा परिसर लगभग एक से दो एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इतने बड़े परिसर में तैयार किए गए पंडाल को आकर्षक रूप देने के लिए विशेष योजना के तहत काम किया गया। इसके निर्माण के लिए पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले के गंगारामपुर स्थित कासिम हाट गांव से विशेष कारीगरों को बुलाया गया था। इन कारीगरों ने करीब ढाई महीने तक लगातार मेहनत की, जिसके बाद यह विशाल पंडाल तैयार हो सका। पंडाल को बनाने में लगे समय और मेहनत से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसकी संरचना तैयार करना कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा।

दिन के समय पंडाल की बनावट और बांस से तैयार की गई कलात्मक संरचना लोगों का ध्यान खींचती है। वहीं, शाम होते ही विशेष रोशनी के कारण इसकी खूबसूरती और बढ़ जाती है। रोशनी से जगमगाता परिसर श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है। नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के यहां पहुंचने की उम्मीद रहती है। श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन करने के साथ-साथ पंडाल की भव्यता और कलात्मक सजावट को भी करीब से देखना चाहते हैं।

हालांकि, भट्टा दुर्गा बाड़ी की पहचान सिर्फ इसके विशाल पंडाल तक सीमित नहीं है। यहां पूजा की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है बंगाली परंपराओं के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन। पूजा समिति के सदस्य निरंजन कुमार दत्ता के मुताबिक, यहां पूजा के दौरान पारंपरिक विधि-विधानों का विशेष ध्यान रखा जाता है। शुद्धिकरण से लेकर पूजा के अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान बंगाली पंडितों द्वारा संपन्न कराए जाते हैं। धार्मिक प्रक्रिया को पारंपरिक तरीके से पूरा करने पर जोर दिया जाता है, ताकि वर्षों से चली आ रही पूजा पद्धति को आगे भी उसी श्रद्धा और मर्यादा के साथ जारी रखा जा सके।

भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया
भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया

भट्टा दुर्गा बाड़ी में पूजा के दौरान महाभोग और प्रसाद का भी विशेष महत्व है। मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करने के लिए उत्सुक रहते हैं। यहां वितरित होने वाला महाभोग लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। पिछले वर्ष महाभोग वितरण के लिए छह हजार कूपन छपवाए गए थे, जिनमें से 5,127 कूपन बिके थे। यह आंकड़ा इस आयोजन में श्रद्धालुओं की भागीदारी और महाभोग के प्रति लोगों की रुचि को दर्शाता है।

पूजा समिति की ओर से प्रसाद वितरण के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा का भी ध्यान रखा जाता है। अष्टमी के दिन महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और अन्य श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग कतारों की व्यवस्था की जाती है, ताकि भीड़ को व्यवस्थित रखा जा सके और लोगों को प्रसाद प्राप्त करने में अनावश्यक परेशानी न हो। धार्मिक आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने की संभावना रहती है, ऐसे में कतारों की उचित व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां सप्तमी से नवमी तक लगातार भोग और प्रसाद वितरित किया जाता है। महानवमी के दिन विशेष व्यवस्था के तहत एक बार में करीब 250 श्रद्धालुओं को बैठाकर महाभोग खिलाया जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ प्रसाद ग्रहण करने का अवसर मिलता है। मां दुर्गा के दर्शन, पारंपरिक पूजा और सामूहिक महाभोग का यह अनुभव श्रद्धालुओं के लिए आयोजन को और खास बना देता है।

भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया
भट्टा दुर्गा बाड़ी पूर्णिया

भट्टा दुर्गा बाड़ी की यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूर्णिया की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक जुड़ाव की भी पहचान है। 110 वर्षों से अधिक समय से जारी पूजा यह बताती है कि किस तरह धार्मिक परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। किसी भी परंपरा को लंबे समय तक जीवित रखने में स्थानीय लोगों, पूजा समिति, पंडितों, कारीगरों और श्रद्धालुओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। भट्टा दुर्गा बाड़ी का आयोजन भी इसी सामूहिक प्रयास का उदाहरण है।

इस वर्ष करीब एक लाख बांस से तैयार किया गया त्रिपुरा आर्ट शैली का पंडाल इस ऐतिहासिक आयोजन को एक नया आकर्षण दे रहा है। पश्चिम बंगाल से आए कारीगरों की ढाई महीने की मेहनत, पारंपरिक बंगाली पूजा पद्धति, महाभोग की व्यवस्था और श्रद्धालुओं की भागीदारी मिलकर इस आयोजन को खास बनाते हैं। यहां आस्था के साथ कला और संस्कृति का ऐसा मेल दिखाई देता है, जो दुर्गा पूजा के वास्तविक उत्साह को सामने लाता है।

कुल मिलाकर, पूर्णिया की भट्टा दुर्गा बाड़ी में मां दुर्गा की पूजा सिर्फ एक वार्षिक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि 110 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा है। एक ओर विशाल पंडाल अपनी कलात्मकता से लोगों को आकर्षित कर रहा है, तो दूसरी ओर बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार होने वाली पूजा इस स्थल की विशिष्ट पहचान को बनाए हुए है। नवरात्र के इस पावन अवसर पर भट्टा दुर्गा बाड़ी एक बार फिर श्रद्धा, संस्कृति और सामूहिक उत्सव का केंद्र बनी हुई है।

फिलहाल, पूर्णिया की भट्टा दुर्गा बाड़ी का यह आयोजन दिखाता है कि समय बदलने के बावजूद आस्था और परंपराओं की जड़ें कितनी मजबूत रह सकती हैं। मां दुर्गा की भक्ति, भव्य पंडाल और बंगाली संस्कृति की यह अनूठी झलक पूर्णिया की धार्मिक पहचान को और समृद्ध बनाती है।

 

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