स्कूल भवन घोटाला: कटिहार जिले के प्राणपुर प्रखंड के दीघापार गांव में स्कूल भवन निर्माण को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में स्कूल भवन बनाने के नाम पर लाखों रुपये की राशि जारी और निकासी की गई, लेकिन जमीन पर भवन का निर्माण हुआ ही नहीं। इसी मामले को लेकर ग्रामीणों ने अनोखे अंदाज में प्रशासन के सामने अपनी नाराजगी दर्ज कराई।
गुरुवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण ढोल-नगाड़े लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के पास पहुंचे। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जिस स्कूल भवन के निर्माण को सरकारी रिकॉर्ड में पूरा बताया जा रहा है, उसकी मौके पर कोई मौजूदगी नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक, जिस स्थान पर विद्यालय भवन का निर्माण होना था, वहां आज भी निर्माण कार्य शुरू होने के कोई ठोस निशान नहीं दिखाई देते।
ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने अपनी शिकायत रखते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की। उनका कहना है कि अगर स्कूल भवन का निर्माण वास्तव में पूरा हो चुका है, तो उसे मौके पर दिखना चाहिए। लेकिन जमीन पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।

सरकारी रिकॉर्ड और जमीन की हकीकत में अंतर का आरोप
ग्रामीणों की शिकायत का सबसे बड़ा आधार सरकारी रिकॉर्ड को बताया जा रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, स्कूल भवन निर्माण से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में 25 मार्च 2025 को निर्माण कार्य पूरा होने का प्रमाण दर्ज है। यानी दस्तावेजों में भवन का निर्माण पूरा बताया गया है।
लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि दीघापार गांव में जिस जगह स्कूल भवन का निर्माण होना था, वहां आज तक भवन खड़ा नहीं हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार, मौके पर एक ईंट तक नहीं लगाई गई है। ऐसे में उनके मन में सवाल उठ रहा है कि जब निर्माण कार्य जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा, तो सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण पूरा होने का प्रमाण किस आधार पर दर्ज किया गया।
ग्रामीणों ने प्रशासन से यह भी सवाल किया कि भवन निर्माण के लिए स्वीकृत राशि का इस्तेमाल कहां किया गया। उनके अनुसार, स्कूल भवन के निर्माण के नाम पर करीब 44.85 लाख रुपये की राशि जारी होने और निकासी की बात सामने आई है।
44.85 लाख रुपये को लेकर उठे सवाल
स्कूल भवन निर्माण से जुड़ी करीब 44.85 लाख रुपये की राशि का मामला ग्रामीणों के विरोध का मुख्य कारण बना हुआ है। ग्रामीणों का आरोप है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद मौके पर स्कूल भवन मौजूद नहीं है।
ग्रामीणों ने अधिकारियों से मांग की कि इस पूरी राशि से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जाए। राशि कब जारी हुई, किस खाते या एजेंसी के माध्यम से भुगतान हुआ, निर्माण कार्य के लिए किन लोगों या संस्थाओं को जिम्मेदारी दी गई और भुगतान किस आधार पर किया गया, इन सभी बिंदुओं की जांच की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ कागजों में निर्माण पूरा दिखा देना पर्याप्त नहीं है। अगर सरकारी योजना के तहत भवन निर्माण के लिए राशि खर्च की गई है, तो उसका परिणाम जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।

ढोल-नगाड़े लेकर प्रशासन के पास पहुंचे ग्रामीण
मामले में ग्रामीणों ने जिस तरह विरोध दर्ज कराया, उसने भी लोगों का ध्यान खींचा। ग्रामीण ढोल-नगाड़े लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के पास पहुंचे और अपनी शिकायत रखी। उनका कहना था कि कई बार सामान्य तरीके से शिकायत करने के बावजूद अगर उनकी समस्या पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो अपनी बात प्रशासन तक पहुंचाने के लिए उन्हें यह तरीका अपनाना पड़ा।
ग्रामीणों ने अधिकारियों के सामने पूरे मामले की जांच की मांग रखी। उन्होंने कहा कि गांव के बच्चों के लिए स्कूल भवन बेहद जरूरी है। यदि भवन निर्माण के लिए सरकारी राशि उपलब्ध कराई गई थी, तो उसका उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए होना चाहिए था।
ग्रामीणों ने प्रशासन से यह भी मांग की कि मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किया जाए और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज जानकारी से उसका मिलान किया जाए।
एसडीओ ने दिया स्थल जांच का आश्वासन
ग्रामीणों की शिकायत के बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया है। एसडीओ की ओर से ग्रामीणों को स्थल जांच कराने का आश्वासन दिया गया है। अब प्रशासनिक टीम मौके पर पहुंचकर यह जांच करेगी कि स्कूल भवन के लिए निर्धारित जमीन पर वास्तव में कोई निर्माण हुआ है या नहीं।
जांच के दौरान सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज निर्माण की स्थिति, स्वीकृत राशि, भुगतान से जुड़े दस्तावेज और मौके पर मौजूद भौतिक स्थिति का मिलान किया जा सकता है। इससे यह स्पष्ट होने में मदद मिलेगी कि निर्माण कार्य वास्तव में हुआ था या नहीं।
प्रशासन के सामने यह भी महत्वपूर्ण सवाल रहेगा कि अगर भवन का निर्माण पूरा बताया गया है, तो मौके पर उसकी स्थिति क्या है। साथ ही, अगर निर्माण नहीं हुआ है तो सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण पूरा होने का प्रमाण किस प्रक्रिया के तहत दर्ज किया गया।

जांच के बाद सामने आएगी असली तस्वीर
फिलहाल इस पूरे मामले में ग्रामीणों के आरोपों की प्रशासनिक स्तर पर जांच की जा रही है। अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि 44.85 लाख रुपये की पूरी राशि किस प्रक्रिया के तहत जारी या खर्च की गई और निर्माण कार्य से जुड़े अधिकारियों या एजेंसी की क्या भूमिका रही।
जांच के बाद ही यह पता चल सकेगा कि सरकारी राशि का इस्तेमाल नियमों के अनुसार हुआ या नहीं। यदि दस्तावेजों और स्थल निरीक्षण के बीच अंतर पाया जाता है, तो प्रशासन संबंधित जिम्मेदार लोगों की भूमिका की भी जांच कर सकता है।
ग्रामीणों की शिकायत के बाद अब स्कूल भवन निर्माण से संबंधित फाइल, स्वीकृति आदेश, भुगतान संबंधी दस्तावेज, निर्माण की प्रगति रिपोर्ट और पूर्णता प्रमाण पत्र जैसे रिकॉर्ड जांच के दायरे में आ सकते हैं।
बच्चों के स्कूल का इंतजार कब होगा खत्म?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल गांव के बच्चों के भविष्य को लेकर है। अगर स्कूल भवन का निर्माण वास्तव में नहीं हुआ है, तो बच्चों को शिक्षा के लिए किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, यह भी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है।
ग्रामीणों की मांग है कि जांच के साथ-साथ गांव में जल्द से जल्द स्कूल भवन निर्माण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए। अगर भवन निर्माण के लिए राशि स्वीकृत हुई थी और किसी कारण से काम अधूरा रह गया है, तो उसे पूरा कराने की दिशा में भी कदम उठाए जाएं।
फिलहाल दीघापार गांव का यह मामला सरकारी रिकॉर्ड और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच कथित अंतर को लेकर चर्चा में है। ग्रामीणों ने अपनी शिकायत प्रशासन तक पहुंचा दी है और एसडीओ ने स्थल जांच का आश्वासन दिया है।
अब सबकी नजर प्रशासनिक जांच पर है। स्थल निरीक्षण और दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि स्कूल भवन निर्माण की वास्तविक स्थिति क्या है, 44.85 लाख रुपये की राशि किस तरह खर्च हुई और सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण पूरा होने का प्रमाण किस आधार पर दर्ज किया गया। यदि जांच में किसी तरह की वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।










