बिहार MLC चुनाव 2026: बिहार में विधान परिषद (MLC) चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी लगातार बढ़ती जा रही है। जैसे-जैसे नामांकन प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनते और बिगड़ते नजर आ रहे हैं। इस बार का चुनाव केवल संख्या बल तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि उम्मीदवारों के चयन को लेकर भी विभिन्न दलों के भीतर और बाहर चर्चा तेज हो गई है।
सोमवार को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सभी नौ उम्मीदवारों ने अपने नामांकन पत्र दाखिल किए। नामांकन के बाद गठबंधन के नेताओं ने एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए जीत का भरोसा जताया। नेताओं ने दावा किया कि NDA पूरी मजबूती के साथ इस चुनाव में उतर रहा है और परिणाम उनके पक्ष में होंगे।

इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (यूनाइटेड) ने चार-चार उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जबकि एक सीट पर गठबंधन के सहयोगी दल को मौका दिया गया है। सीटों के बंटवारे को लेकर पहले से ही राजनीतिक हलकों में चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह स्थिति और स्पष्ट हो गई है।
हालांकि, NDA की उम्मीदवार सूची में एक नाम की अनुपस्थिति ने सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश का नाम इस सूची में शामिल नहीं किया गया है। इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं कि आखिर उन्हें इस बार मौका क्यों नहीं दिया गया।

दीपक प्रकाश को लेकर केवल उम्मीदवार सूची ही नहीं, बल्कि एक अलग विवाद भी सामने आया है। उनके दोबारा मंत्री बनाए जाने को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया गया है कि बिना निर्वाचित जनप्रतिनिधि बने उन्हें दोबारा मंत्री पद कैसे दिया गया। इस मुद्दे पर अब कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।
वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन की ओर से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के उम्मीदवार सुनील सिंह ने भी अपना नामांकन दाखिल किया है। उनकी उम्मीदवारी को लेकर भी पार्टी के भीतर और बाहर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए हैं कि क्या RJD के पास अन्य अनुभवी नेताओं की कमी थी, जिसके कारण उन्हें उम्मीदवार बनाया गया।

RJD नेतृत्व की ओर से हालांकि इस पर स्पष्ट रुख सामने नहीं आया है, लेकिन पार्टी के भीतर यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। सुनील सिंह की उम्मीदवारी को लेकर राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी की रणनीति का हिस्सा भी मान रहे हैं, जिसका उद्देश्य विभिन्न जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधना हो सकता है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार विधान परिषद का यह चुनाव भले ही संख्याबल के आधार पर एकतरफा माना जा रहा हो, लेकिन उम्मीदवारों के चयन ने इसे काफी दिलचस्प बना दिया है। हर दल अपने-अपने स्तर पर सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है, जिससे कई पुराने समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं।

NDA खेमे में जहां उम्मीदवारों के चयन को लेकर एक तरह की मजबूती और संगठनात्मक एकता का संदेश देने की कोशिश की गई है, वहीं कुछ नामों को लेकर अंदरूनी असंतोष की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही हैं। हालांकि सार्वजनिक तौर पर सभी दल एकजुटता और जीत के दावे कर रहे हैं।
यदि उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से अधिक रहती है, तो 18 जून को मतदान कराया जाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति और भी ज्यादा सक्रिय और रोमांचक होने की संभावना है। सभी दल अपने-अपने स्तर पर विधायकों और समर्थकों को साधने में जुट गए हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव केवल विधान परिषद की सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले विधानसभा और अन्य राजनीतिक समीकरणों के लिए भी एक संकेत माना जा सकता है। इसलिए हर पार्टी इस चुनाव को गंभीरता से ले रही है।
फिलहाल, सभी की नजर नामांकन प्रक्रिया के बाद की स्थिति और अंतिम उम्मीदवारों की सूची पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सा गठबंधन अपनी रणनीति में सफल होता है और किसे राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
बिहार की राजनीति में यह चुनाव एक बार फिर यह साबित कर रहा है कि यहां हर चुनाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि रणनीति, समीकरण और नेतृत्व की परीक्षा भी होता है।










