रौशनी की इस उपलब्धि की खबर सामने आने के बाद उनके परिवार, गांव, मित्रों और शुभचिंतकों में खुशी का माहौल है। एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाली रौशनी की कहानी यह बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों और समाज में बदलाव लाने का जुनून हो, तो परिस्थितियां भी किसी के रास्ते की बाधा नहीं बन सकतीं।

जिनेवा के बाद अब केप टाउन में गूंजेगी आवाज
रौशनी परवीन के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना कोई पहला अवसर नहीं है। इससे पहले वर्ष 2023 में उन्होंने जिनेवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय युवा सम्मेलन में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था। उस समय भी उन्होंने सामाजिक मुद्दों और महिलाओं से जुड़े सवालों को वैश्विक स्तर पर रखने का अवसर हासिल किया था।
अब एक बार फिर उन्हें दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में आयोजित होने वाले वन यंग सम्मेलन में शामिल होने का मौका मिला है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस सम्मेलन में दुनिया के 190 से अधिक देशों के युवा भाग लेने वाले हैं। ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और बिहार का प्रतिनिधित्व करना रौशनी के लिए गर्व की बात है।
रौशनी का कहना है कि इस सम्मेलन के माध्यम से उन्हें बाल विवाह, महिला उत्पीड़न और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को दुनिया के सामने रखने का अवसर मिलेगा। साथ ही अलग-अलग देशों से आने वाले युवाओं के साथ अपने अनुभव साझा करने और सामाजिक बदलाव को लेकर विचारों का आदान-प्रदान करने का मौका भी मिलेगा।

किशनगंज के छोटे से गांव से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक का सफर
रौशनी परवीन का जन्म किशनगंज जिले की टेउसा पंचायत के सिमलबाड़ी गांव में हुआ। उनके पिता हैदर अली गांव में किराना दुकान चलाते हैं। उनका परिवार साधारण आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आता है। लेकिन रौशनी ने अपनी परिस्थितियों को कभी अपनी मंजिल के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।
एक छोटे से गांव में पली-बढ़ीं रौशनी ने बचपन से ही समाज में मौजूद कई ऐसी समस्याओं को करीब से देखा, जिनका सामना आज भी बड़ी संख्या में लड़कियों और महिलाओं को करना पड़ता है। बाल विवाह, महिलाओं के साथ होने वाला उत्पीड़न, शिक्षा और अधिकारों से वंचित रहना जैसी समस्याओं ने उन्हें अंदर तक प्रभावित किया।
इन्हीं परिस्थितियों के बीच उन्होंने समाज के लिए काम करने का फैसला किया। उन्होंने तय किया कि वह उन लड़कियों और महिलाओं की आवाज बनेंगी, जिन्हें सामाजिक दबाव, पारिवारिक परिस्थितियों या जागरूकता की कमी के कारण अपने अधिकारों से समझौता करना पड़ता है।
सामाजिक चुनौतियों के बावजूद नहीं मानी हार
रौशनी परवीन की सफलता का रास्ता आसान नहीं रहा। सामाजिक कार्यों में सक्रिय होने के शुरुआती दौर में उन्हें कई चुनौतियों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। खासकर सामाजिक रूढ़ियों और परंपरागत सोच के कारण उनके सामने कई तरह की बाधाएं आईं।
लेकिन उन्होंने इन मुश्किलों को अपने लक्ष्य से पीछे हटने की वजह नहीं बनने दिया। आलोचनाओं के बावजूद वह लगातार अपने काम में जुटी रहीं। उनका मानना रहा कि समाज में बदलाव लाने के लिए केवल समस्याओं की चर्चा करना काफी नहीं है, बल्कि जरूरतमंद लोगों तक पहुंचकर उनके लिए काम करना भी जरूरी है।
यही सोच धीरे-धीरे उनकी पहचान बनती चली गई। आज रौशनी परवीन को सीमांचल की उन महिलाओं में गिना जा रहा है, जिन्होंने सामाजिक कार्यों के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई है।

दस वर्षों से बाल विवाह और महिला अधिकारों के लिए संघर्ष
रौशनी परवीन पिछले करीब दस वर्षों से सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने बाल विवाह रोकने, महिला उत्पीड़न के मामलों में सहायता करने और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए लगातार काम किया है।
बाल विवाह आज भी देश के कई ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में एक गंभीर सामाजिक समस्या बना हुआ है। कम उम्र में लड़कियों की शादी होने से उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता और भविष्य पर गहरा असर पड़ता है। कई बार सामाजिक दबाव और आर्थिक मजबूरियों के कारण परिवार कम उम्र में ही बेटियों की शादी करने का फैसला कर लेते हैं।
रौशनी परवीन ने इसी समस्या के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। अपने सामाजिक प्रयासों के जरिए वह अब तक सैकड़ों बच्चियों को बाल विवाह की त्रासदी से बचाने में अहम भूमिका निभा चुकी हैं।
उनका काम केवल बाल विवाह रोकने तक सीमित नहीं है। वह महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने, उत्पीड़न से प्रभावित महिलाओं को सहायता उपलब्ध कराने और जरूरतमंद महिलाओं को सरकारी योजनाओं से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही हैं।
महिला हेल्पलाइन में निभा रहीं अहम जिम्मेदारी
वर्तमान में रौशनी परवीन महिला हेल्पलाइन में केंद्र प्रशासिका के पद पर कार्यरत हैं। इस जिम्मेदारी के तहत महिलाओं से जुड़े मामलों और उनकी समस्याओं को समझने तथा उन्हें उचित सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम करने का अवसर मिलता है।
महिला हेल्पलाइन उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माध्यम है, जो घरेलू हिंसा, उत्पीड़न या अन्य सामाजिक समस्याओं का सामना कर रही हैं। कई महिलाएं जानकारी के अभाव, सामाजिक दबाव या परिवार के डर से अपनी समस्याएं सामने नहीं रख पातीं। ऐसे में उन्हें सही मार्गदर्शन और सहायता उपलब्ध कराना बेहद जरूरी हो जाता है।
रौशनी अपने अनुभवों के जरिए महिलाओं को जागरूक करने और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का प्रयास कर रही हैं। उनका उद्देश्य है कि जरूरतमंद महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और समाज की मुख्यधारा में सम्मान के साथ अपनी जगह बना सकें।
केप टाउन में दुनिया के युवाओं के सामने रखेंगी सीमांचल के मुद्दे
अब रौशनी परवीन के सामने एक बड़ा अवसर है। दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में आयोजित होने वाला वन यंग सम्मेलन उन्हें अपनी वर्षों की सामाजिक सक्रियता और अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा करने का मंच देगा।
रौशनी के अनुसार, इस सम्मेलन में 190 से अधिक देशों के युवा शामिल होंगे। यहां उन्हें अलग-अलग देशों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने और बाल विवाह, महिला उत्पीड़न तथा महिलाओं से जुड़ी दूसरी सामाजिक समस्याओं पर चर्चा करने का अवसर मिलेगा।
खास बात यह है कि रौशनी केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों का प्रतिनिधित्व नहीं करेंगी, बल्कि उन बच्चियों और महिलाओं की समस्याओं को भी दुनिया के सामने रखने का प्रयास करेंगी, जिनकी आवाज अक्सर स्थानीय स्तर पर ही दबकर रह जाती है।
सीमांचल जैसे क्षेत्र से निकलकर वैश्विक मंच तक पहुंचना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। यह दिखाता है कि सामाजिक बदलाव की कोशिशें केवल बड़े शहरों या बड़े संस्थानों तक सीमित नहीं हैं। गांवों में काम करने वाले लोग भी अपने प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकते हैं।
बधाइयों का लगा तांता, युवतियों के लिए बनीं प्रेरणा
रौशनी परवीन की इस उपलब्धि पर डॉ. आमिर मिन्हाज, मोहम्मद नोमान आलम सहित कई लोगों ने उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। शुभचिंतकों का कहना है कि रौशनी ने सामाजिक चुनौतियों और आलोचनाओं के बावजूद अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। उनकी मेहनत, साहस और समाज के प्रति समर्पण ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है।
लोगों का मानना है कि उनकी सफलता से खासकर सीमांचल की युवतियों को प्रेरणा मिलेगी। क्षेत्र की बेटियां यह समझ सकेंगी कि शिक्षा, मेहनत और दृढ़ संकल्प के सहारे वे भी अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं।
रौशनी की कहानी उन परिवारों के लिए भी एक संदेश है, जो सामाजिक परिस्थितियों या सीमित संसाधनों के कारण अपनी बेटियों के सपनों को आगे बढ़ाने में हिचकिचाते हैं। प्रतिभा किसी खास शहर, परिवार या आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। जरूरत होती है अवसर, मेहनत और आगे बढ़ने के हौसले की।
गांव से वैश्विक मंच तक बदलाव की मिसाल
किशनगंज के सिमलबाड़ी गांव से शुरू हुआ रौशनी परवीन का सफर अब दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन तक पहुंच चुका है। जिनेवा में भारत का प्रतिनिधित्व करने के बाद अब उन्हें एक बार फिर दुनिया के सामने अपनी बात रखने का अवसर मिला है।
लेकिन उनकी असली पहचान केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी तक सीमित नहीं है। उनकी पहचान उन बच्चियों की मदद करने, महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों से जुड़ी है।
अब सबकी निगाहें केप टाउन में होने वाले सम्मेलन पर हैं, जहां रौशनी परवीन बाल विवाह और महिला उत्पीड़न जैसे मुद्दों को वैश्विक मंच पर उठाएंगी।
सीमांचल की इस बेटी की उपलब्धि पूरे बिहार के लिए गर्व का विषय है। रौशनी की कहानी यह संदेश देती है कि बदलाव की शुरुआत किसी बड़े शहर से ही हो, यह जरूरी नहीं। कभी-कभी बदलाव की सबसे मजबूत आवाज गांव की छोटी-सी गली से भी उठती है और पूरी दुनिया तक पहुंच जाती है।










