बेखौफ जुबां बे बाक अंदाज

MLC दल-बदल विवाद: निर्दलीय MLC के BJP में शामिल होने पर बिहार में सियासी घमासान, मनोज झा ने मांगी सदस्यता रद्द करने की मांग

Share Now :

WhatsApp

MLC दल-बदल विवाद: बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय जनता दल ने दोनों विधान पार्षदों के इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे दल-बदल कानून के प्रावधानों के खिलाफ बताया है। आरजेडी ने इस मामले में दोनों नेताओं की विधान परिषद सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई है। पार्टी का कहना है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने का मामला संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत जांच के दायरे में आता है।

इस मुद्दे को लेकर रविवार को पटना स्थित राष्ट्रीय जनता दल के कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। इसमें राज्यसभा सांसद मनोज झा ने पार्टी का पक्ष रखते हुए भाजपा में शामिल हुए दोनों विधान पार्षदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरजेडी इस मामले को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित संस्थाओं के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराएगी।

MLC दल-बदल विवाद
MLC दल-बदल विवाद

दो निर्दलीय MLC के भाजपा में शामिल होने से शुरू हुआ विवाद

दरअसल, बिहार विधान परिषद के चुनाव में दो उम्मीदवारों ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की थी। इनमें तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से डॉ. राहुल राज शामिल हैं।

दोनों नेताओं ने चुनाव के दौरान किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। चुनाव परिणाम आने के बाद दोनों ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।

इसी घटनाक्रम के बाद बिहार की राजनीति में दल-बदल को लेकर बहस शुरू हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल ने इस कदम को लेकर सवाल उठाए हैं। आरजेडी का तर्क है कि जब दोनों नेता निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर विधान परिषद पहुंचे हैं, तो इसके बाद भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के संवैधानिक और कानूनी पहलुओं की जांच होनी चाहिए।

पार्टी का कहना है कि इस मामले में यह देखना जरूरी है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल से जुड़े प्रावधान किस तरह लागू होते हैं और क्या इस घटनाक्रम के आधार पर दोनों विधान पार्षदों की सदस्यता पर कोई प्रभाव पड़ सकता है।

मनोज झा ने उठाया संविधान की दसवीं अनुसूची का मुद्दा

पटना में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा कि दोनों विधान पार्षदों ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने के बाद भाजपा की सदस्यता ली है। उनके मुताबिक, यह मामला संविधान की दसवीं अनुसूची और दल-बदल कानून के प्रावधानों के तहत विचारणीय है।

मनोज झा ने कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि के राजनीतिक फैसले का मूल्यांकन संवैधानिक नियमों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने इस पूरे मामले में संबंधित संवैधानिक संस्थाओं से हस्तक्षेप करने की मांग की।

आरजेडी सांसद ने कहा कि पार्टी इस संबंध में बिहार विधान परिषद के सभापति और चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराएगी। इसके साथ ही उन्होंने विधान परिषद के सभापति से मांग की कि दोनों नवनिर्वाचित विधान पार्षदों के मामले पर विचार करते हुए उन्हें अयोग्य घोषित करने की कार्रवाई की जाए।

मनोज झा का कहना है कि इस तरह के मामलों में संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि यदि शिकायत पर कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो इस मुद्दे पर राजनीतिक विवाद और गहरा सकता है।

MLC दल-बदल विवाद
MLC दल-बदल विवाद

किस आधार पर सदस्यता रद्द करने की मांग कर रही है RJD?

इस पूरे विवाद के केंद्र में संविधान की दसवीं अनुसूची है, जिसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है। इस कानून का उद्देश्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक दल बदलने से जुड़े मामलों को नियंत्रित करना और विधायी संस्थाओं में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है।

हालांकि, इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी है कि दोनों विधान पार्षदों ने चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीता था। इसलिए उनके मामले में दसवीं अनुसूची के प्रावधानों की वास्तविक प्रयोज्यता और सदस्यता से जुड़े नियमों की व्याख्या महत्वपूर्ण होगी।

दल-बदल विरोधी कानून में निर्दलीय निर्वाचित सदस्य के किसी राजनीतिक दल में शामिल होने को लेकर अलग प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे में केवल राजनीतिक आरोप या आपत्ति के आधार पर सदस्यता समाप्त नहीं होती। इसके लिए संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार शिकायत, सुनवाई और सक्षम प्राधिकारी का निर्णय जरूरी होता है।

यही वजह है कि अब इस मामले में बिहार विधान परिषद के सभापति की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। आरजेडी की ओर से शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद यह देखा जाएगा कि सभापति इस पर क्या निर्णय लेते हैं और क्या मामले में आगे किसी तरह की कानूनी प्रक्रिया शुरू होती है।

बंशीधर ब्रजवासी और डॉ. राहुल राज के फैसले पर सियासी बहस

तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से डॉ. राहुल राज की जीत ने पहले ही बिहार की राजनीतिक गतिविधियों में चर्चा पैदा की थी। दोनों ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतकर विधान परिषद में जगह बनाई थी।

लेकिन चुनाव परिणाम के बाद भाजपा में शामिल होने के उनके फैसले ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है। आरजेडी ने इसे दल-बदल कानून से जोड़ते हुए आपत्ति जताई है, जबकि अब इस मामले का कानूनी पक्ष संबंधित संस्थाओं के सामने आने की संभावना है।

इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने की स्थिति में सदस्यता पर क्या असर पड़ सकता है।

हालांकि, इस सवाल का अंतिम जवाब संबंधित कानूनी प्रावधानों और सक्षम प्राधिकारी के फैसले पर निर्भर करेगा। फिलहाल आरजेडी ने अपना विरोध दर्ज कराने और शिकायत की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही है।

MLC दल-बदल विवाद
MLC दल-बदल विवाद

विधान परिषद के सभापति और चुनाव आयोग की भूमिका पर नजर

अब इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा नजर बिहार विधान परिषद के सभापति और चुनाव आयोग के रुख पर रहेगी। आरजेडी ने दोनों संस्थाओं के सामने अपनी शिकायत रखने की बात कही है।

विधान परिषद के सभापति के सामने यह सवाल होगा कि शिकायत में उठाए गए तथ्यों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर किस तरह की कार्रवाई की जा सकती है। वहीं चुनाव आयोग के समक्ष भी आरजेडी अपना पक्ष रखने की तैयारी में है।

यह भी महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत में किन कानूनी आधारों और दस्तावेजों का उल्लेख किया जाता है तथा संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का कितना अवसर मिलता है।

किसी भी जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त करना एक गंभीर संवैधानिक प्रक्रिया है। इसलिए इस मामले में राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ कानूनी तथ्यों और निर्धारित प्रक्रिया का महत्व भी काफी अधिक है।

बिहार की राजनीति में बढ़ सकती है बयानबाजी

दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भाजपा में शामिल होने के बाद शुरू हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन सकता है। एक तरफ आरजेडी ने इसे दल-बदल कानून का मामला बताते हुए सदस्यता रद्द करने की मांग की है, तो दूसरी तरफ अब संबंधित संस्थाओं की प्रक्रिया और निर्णय का इंतजार रहेगा।

फिलहाल इस मामले में सदस्यता समाप्त होने का कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। आरजेडी ने शिकायत दर्ज कराने और संवैधानिक रास्ता अपनाने की बात कही है।

कुल मिलाकर, बंशीधर ब्रजवासी और डॉ. राहुल राज के भाजपा में शामिल होने से शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर संवैधानिक और कानूनी बहस का रूप लेता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बिहार विधान परिषद के सभापति और चुनाव आयोग इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं।

क्या आरजेडी की मांग पर दोनों विधान पार्षदों की सदस्यता को लेकर कोई कार्रवाई होगी, या फिर इस मामले में कोई अलग कानूनी व्याख्या सामने आएगी? फिलहाल इसका जवाब संबंधित संस्थाओं के फैसले के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

8 Views

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Other News

error: JEB News is copyright content