कटिहार की लक्ष्मी: कटिहार की 13 वर्षीय लक्ष्मी की कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और मजबूत इरादों की ऐसी मिसाल है, जो हर किसी को प्रेरित करती है। जन्म से ही दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद लक्ष्मी ने अपनी परिस्थितियों को कभी अपने सपनों के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया। वह अपने पैरों की उंगलियों के बीच पेन पकड़कर लिखती है और पूरे मन से पढ़ाई करती है। उसका सपना है कि वह बड़ी होकर शिक्षिका बने और अपने पैरों पर खड़ी होकर एक आत्मनिर्भर जिंदगी जिए।
लक्ष्मी हसनगंज प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय भतोरिया में कक्षा चार की छात्रा है। उसके लिए स्कूल जाना सिर्फ पढ़ाई का हिस्सा नहीं, बल्कि अपने भविष्य को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वह नियमित रूप से विद्यालय पहुंचती है और अन्य बच्चों की तरह कक्षा में बैठकर पढ़ाई करती है। खास बात यह है कि लिखने के लिए उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं पड़ती। वह अपने पैरों की उंगलियों के बीच पेन को मजबूती से पकड़कर कॉपी पर लिखती है।

पैरों से लिखकर पूरा करती है स्कूल का काम
लक्ष्मी की पढ़ाई के प्रति लगन उसके शिक्षकों और सहपाठियों के लिए भी प्रेरणा का कारण बनी हुई है। स्कूल में मिलने वाले शैक्षणिक कार्यों को वह अपनी क्षमता के अनुसार पूरा करती है। उसके सामने चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन वह उन्हें बहाना नहीं बनाती।
लक्ष्मी पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी सक्रिय रहती है। उसकी दिनचर्या में स्कूल, पढ़ाई और खेल सभी शामिल हैं। वह अन्य बच्चों की तरह अपने दोस्तों के साथ समय बिताती है और स्कूल की गतिविधियों में भाग लेती है।
लक्ष्मी का कहना है कि उसे पढ़ना बहुत पसंद है। वह भविष्य में शिक्षिका बनना चाहती है। उसके इस सपने में उसके माता-पिता और शिक्षक भी उसका पूरा साथ दे रहे हैं।
शिक्षक भी बढ़ाते हैं लक्ष्मी का हौसला
स्कूल की शिक्षिका रिंकू कुमारी के अनुसार, लक्ष्मी पढ़ाई में काफी मेहनत करती है। शारीरिक चुनौती के बावजूद उसके अंदर सीखने की इच्छा मजबूत है। शिक्षक भी उसकी मेहनत को देखते हुए उसका उत्साह बढ़ाते हैं।
विद्यालय के शिक्षकों का मानना है कि लक्ष्मी को अगर पढ़ाई के लिए उचित संसाधन, सुविधाएं और जरूरी सहयोग मिले तो वह भविष्य में और बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। उन्होंने सरकार से भी अपील की है कि बच्ची की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उसे आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
लक्ष्मी के लिए स्कूल का वातावरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां उसे बाकी बच्चों की तरह सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। शिक्षक उसके आत्मविश्वास को बनाए रखने और उसे पढ़ाई के प्रति प्रेरित करने की कोशिश करते हैं।

स्वास्थ्य विभाग ने जारी किया दिव्यांगता प्रमाणपत्र
विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग की टीम ने लक्ष्मी की जांच की है। जांच के बाद उसे 100 प्रतिशत दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी किया गया है।
हसनगंज के प्रखंड चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. आयुष भारद्वाज ने भी बच्ची की जांच की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से लक्ष्मी को हर संभव सहायता देने का प्रयास किया जाएगा।
दिव्यांगता प्रमाणपत्र मिलने के बाद लक्ष्मी के परिवार को उम्मीद है कि सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ दिलाने में भी मदद मिलेगी। परिवार चाहता है कि बेटी की पढ़ाई किसी भी स्थिति में न रुके।
बेटी को छोड़ने की सलाह मिली, लेकिन माता-पिता ने नहीं मानी
लक्ष्मी की मां रेणु देवी बताती हैं कि जब बेटी का जन्म हुआ था, तब परिवार के सामने कई तरह की परेशानियां थीं। कुछ लोगों ने तो बच्ची को छोड़ देने तक की सलाह दी थी। लेकिन माता-पिता ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया।
उन्होंने अपनी बेटी को बोझ मानने के बजाय उसे प्यार, देखभाल और हिम्मत के साथ बड़ा किया। माता-पिता का मानना है कि हर बच्चे को आगे बढ़ने का अधिकार है और लक्ष्मी भी अपने सपनों को पूरा कर सकती है।
परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। लक्ष्मी के माता-पिता मजदूरी करके घर का खर्च चलाते हैं। इसी मेहनत की कमाई से वे अपनी बेटी की पढ़ाई और जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करते हैं।
कम आमदनी के बावजूद माता-पिता ने लक्ष्मी की शिक्षा को प्राथमिकता दी है। उनका सपना है कि बेटी अच्छी तरह पढ़े, अपने पैरों पर खड़ी हो और भविष्य में किसी पर निर्भर न रहे।
मुश्किलों के बीच भी नहीं छोड़ा पढ़ाई का रास्ता
लक्ष्मी की जिंदगी में चुनौतियां बचपन से ही रही हैं, लेकिन उसने अपने हौसले को कमजोर नहीं होने दिया। जिस काम को दूसरे बच्चे हाथों से आसानी से कर लेते हैं, उसे लक्ष्मी अपने पैरों की मदद से करती है। इसके बावजूद उसके चेहरे पर आत्मविश्वास दिखाई देता है।
उसकी कहानी यह बताती है कि किसी व्यक्ति की क्षमता केवल उसकी शारीरिक स्थिति से तय नहीं होती। इच्छाशक्ति और मेहनत के दम पर कठिन परिस्थितियों को भी पीछे छोड़ा जा सकता है।
लक्ष्मी की पढ़ाई के प्रति लगन उसके परिवार के लिए उम्मीद है। उसके शिक्षक भी मानते हैं कि अगर उसे सही मार्गदर्शन और सुविधाएं मिलती रहीं, तो वह अपने सपने को जरूर पूरा कर सकती है।

शिक्षिका बनने का सपना
लक्ष्मी का सबसे बड़ा सपना शिक्षिका बनना है। वह पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहती है और भविष्य में बच्चों को पढ़ाना चाहती है। उसके इस सपने में एक खास संदेश भी छिपा है—वह सिर्फ अपने लिए आगे नहीं बढ़ना चाहती, बल्कि दूसरों के जीवन में भी शिक्षा की रोशनी पहुंचाना चाहती है।
उसके माता-पिता भी चाहते हैं कि बेटी की पढ़ाई जारी रहे। परिवार की आर्थिक परेशानियां उनके सामने जरूर हैं, लेकिन वे लक्ष्मी के भविष्य को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ रहे हैं।
लक्ष्मी की कहानी देती है बड़ा संदेश
कटिहार की लक्ष्मी की कहानी केवल एक बच्ची के संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, इंसान अपने सपनों को छोड़ने से इनकार कर देता है।
लक्ष्मी के पास दोनों हाथ नहीं हैं, लेकिन उसके पास आत्मविश्वास है। वह पैरों से लिखती है, पढ़ाई करती है, खेलती है और भविष्य के सपने देखती है। उसके माता-पिता मजदूरी करके बेटी को पढ़ा रहे हैं और शिक्षक उसकी मेहनत को लगातार प्रोत्साहित कर रहे हैं।
आज लक्ष्मी की जरूरत सिर्फ सहानुभूति की नहीं, बल्कि अवसर और सहयोग की है। अगर उसे शिक्षा, तकनीकी सहायता और सरकारी सुविधाओं का पूरा लाभ मिलता है, तो उसकी प्रतिभा और मजबूत होकर सामने आ सकती है।
लक्ष्मी यह साबित कर रही है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए हमेशा आसान रास्ते जरूरी नहीं होते। जरूरी है कि इंसान अपने लक्ष्य को लेकर दृढ़ रहे। हाथों के बिना पैरों से लिखती यह बच्ची अपने सपनों की इबारत खुद लिख रही है और उसकी कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल परिस्थितियों के सामने हार मान लेते हैं।










