मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत के निर्देश पर किशनगंज टाउन थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। अब पुलिस पूरे प्रकरण की जांच में जुट गई है। हालांकि, अभी तक इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मदरसे के खाते से सरकारी राशि निकालने के लिए वास्तव में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया या नहीं।
दरअसल, यह पूरा मामला मदरसा एहसानिया, रूईधासा बजरादंगा से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता गुफरान जावेद किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड अंतर्गत बैगना गांव के निवासी हैं। उनका कहना है कि मदरसे के सचिव पद को लेकर वर्ष 2018 में एक महत्वपूर्ण फैसला लिया गया था। उस समय उनके पिता रईमउद्दीन का निधन हो चुका था। इसके बाद मदरसे की आम सभा की बैठक आयोजित की गई, जिसमें प्रस्ताव पारित कर गुफरान जावेद को सचिव नियुक्त किया गया था।

गुफरान जावेद के अनुसार, सचिव पद पर उनकी नियुक्ति से संबंधित जरूरी दस्तावेज तैयार किए गए थे। इन दस्तावेजों को पटना स्थित मदरसा बोर्ड में जमा कराने की जिम्मेदारी हेड मौलवी मोहम्मद जहुर आलम को दी गई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्होंने अपनी नियुक्ति से जुड़े सभी जरूरी कागजात भरोसे के साथ हेड मौलवी को सौंप दिए थे, ताकि सचिव पद से संबंधित औपचारिक प्रक्रिया पूरी की जा सके।
लेकिन कुछ समय बाद इस मामले में एक नया मोड़ आ गया। जावेद के मुताबिक, हेड मौलवी मोहम्मद जहुर आलम ने उन्हें जानकारी दी कि पटना मदरसा बोर्ड से सचिव पद की मंजूरी नहीं मिली है। साथ ही उन्हें बताया गया कि मदरसे के संचालन के लिए ट्रस्ट का गठन करना जरूरी है।
इसके बाद मदरसे के लिए एक ट्रस्ट गठित किया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि इस ट्रस्ट में भी उन्हें सचिव की जिम्मेदारी दी गई थी। शुरुआत में उन्हें लगा कि मदरसे के संचालन और प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
हालांकि, गुफरान जावेद ने आरोप लगाया है कि इसी दौरान हेड मौलवी ने उन्हें भरोसे में लेकर कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए। उनका दावा है कि इन दस्तावेजों का वास्तविक उद्देश्य और उनमें दर्ज जानकारियों के बारे में उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई थी।

यहीं से इस पूरे मामले को लेकर संदेह पैदा होने लगा। शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि उनके नाम और हस्ताक्षर का इस्तेमाल आगे चलकर बैंक खाते से संबंधित किसी प्रक्रिया में किया जा सकता है।
अब इस मामले में सबसे अहम घटना पिछले साल दिसंबर की बताई जा रही है। गुफरान जावेद के मुताबिक, दिसंबर में वह अपने किसी निजी काम से किशनगंज स्थित एचडीएफसी बैंक की शाखा पहुंचे थे। इसी दौरान उन्होंने वहां हेड मौलवी मोहम्मद जहुर आलम को बैंक मैनेजर से बातचीत करते हुए देखा।
जावेद का कहना है कि हेड मौलवी के हाथ में एक फाइल थी। जब उन्होंने उस फाइल पर नजर डाली तो उस पर उनका नाम लिखा हुआ दिखाई दिया। यह देखकर उन्हें हैरानी हुई और उन्होंने फाइल के संबंध में जानकारी हासिल करने की कोशिश की।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, जब उन्होंने हेड मौलवी से पूछा कि उनके नाम से संबंधित फाइल बैंक में क्यों रखी गई है और उसमें क्या दस्तावेज हैं, तो उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। आरोप है कि हेड मौलवी ने मामले को गोपनीय बताते हुए फाइल अपने पास रख ली और इसके बाद बैंक से चले गए।

इस घटना के बाद गुफरान जावेद को शक हुआ कि उनके नाम और दस्तावेजों का इस्तेमाल उनकी जानकारी के बिना किया जा रहा है। उन्होंने मामले की जानकारी जुटाने की कोशिश शुरू की।
जावेद का आरोप है कि बाद में उन्हें पता चला कि उनके नाम से एचडीएफसी बैंक में एक संयुक्त खाता खुलवाया गया था। इस जानकारी के सामने आने के बाद उन्होंने बैंक खाते को लेकर कई सवाल उठाए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गुफरान जावेद को इस खाते की जानकारी नहीं थी, तो उनके नाम से संयुक्त बैंक खाता किस आधार पर खोला गया? खाता खोलने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज जमा किए गए? उन दस्तावेजों पर किए गए हस्ताक्षर वास्तविक थे या कथित तौर पर उनका फर्जी इस्तेमाल किया गया?
इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि मदरसे की सरकारी राशि इस खाते से जुड़ी हुई थी या नहीं। यदि सरकारी धन इस खाते में आया या यहां से निकाला गया, तो उसकी कुल रकम कितनी थी और उसका इस्तेमाल किन कार्यों के लिए किया गया?
शिकायतकर्ता ने हेड मौलवी मोहम्मद जहुर आलम के साथ-साथ एचडीएफसी बैंक की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि बैंक के स्तर पर भी ऐसी प्रक्रिया अपनाई गई, जिसके जरिए उनके नाम से संयुक्त खाता संचालित किया गया। उन्होंने इस पूरे प्रकरण में मिलीभगत की आशंका जताई है।
हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बैंक और हेड मौलवी के खिलाफ लगाए गए आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता के दावे हैं। बैंक की ओर से इस मामले में क्या पक्ष रखा गया है, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। पुलिस जांच के बाद ही यह सामने आएगा कि खाता खोलने की प्रक्रिया में बैंक के अधिकारियों की कोई लापरवाही या अनियमितता हुई थी या नहीं।
मामले में कानूनी कार्रवाई के लिए गुफरान जावेद ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद अदालत के निर्देश पर किशनगंज टाउन थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। अब पुलिस इस पूरे मामले के विभिन्न पहलुओं की जांच कर रही है।
जांच के दौरान पुलिस के सामने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की पड़ताल करना जरूरी होगा। सबसे पहले वर्ष 2018 में सचिव पद पर नियुक्ति के लिए पारित आम सभा के प्रस्ताव और उससे संबंधित दस्तावेजों की जांच करनी होगी। इसके बाद पटना मदरसा बोर्ड में जमा किए गए कागजात और ट्रस्ट गठन से जुड़े रिकॉर्ड की भी पड़ताल करनी होगी।
इसके साथ ही एचडीएफसी बैंक में खोले गए कथित संयुक्त खाते के दस्तावेज, खाता खोलने की तारीख, केवाईसी रिकॉर्ड, हस्ताक्षर और बैंकिंग लेनदेन की जानकारी हासिल करना भी महत्वपूर्ण होगा।
यदि दस्तावेजों में हस्ताक्षर को लेकर संदेह सामने आता है, तो उनकी फॉरेंसिक जांच के जरिए वास्तविकता का पता लगाया जा सकता है। वहीं, बैंक खाते से सरकारी राशि की निकासी हुई है या नहीं, इसकी जानकारी बैंक स्टेटमेंट और संबंधित वित्तीय रिकॉर्ड से मिल सकती है।
इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल मदरसे की सरकारी राशि की सुरक्षा और उसके पारदर्शी इस्तेमाल को लेकर भी है। आखिर मदरसे के नाम पर आने वाली सरकारी सहायता का हिसाब-किताब किसके पास था? क्या मदरसे के सचिव को बैंक खाते और वित्तीय लेनदेन की जानकारी दी जाती थी? और यदि उनके नाम से खाता खोला गया, तो क्या इसके लिए उनकी विधिवत सहमति ली गई थी?
फिलहाल, इन सभी सवालों के जवाब पुलिस जांच के बाद ही सामने आ सकेंगे। पुलिस के लिए यह भी जरूरी होगा कि शिकायतकर्ता, हेड मौलवी और बैंक से जुड़े संबंधित लोगों के बयान दर्ज कर दस्तावेजों का मिलान किया जाए।
कुल मिलाकर, किशनगंज के मदरसा एहसानिया से जुड़ा यह मामला केवल सचिव पद के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कथित फर्जी हस्ताक्षर, संयुक्त बैंक खाते और सरकारी राशि के संभावित दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
अब देखना होगा कि पुलिस जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं। क्या वास्तव में गुफरान जावेद के नाम और हस्ताक्षर का इस्तेमाल उनकी जानकारी के बिना किया गया था? क्या मदरसे की सरकारी राशि निकालने के लिए बैंक खाते का दुरुपयोग हुआ? और इस पूरे मामले में हेड मौलवी तथा बैंक की भूमिका क्या रही?
इन सभी सवालों का जवाब जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।










