पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने महिला आरक्षण बिल को लेकर केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करते हुए राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार का रवैया पहले और अब के बीच विरोधाभासी नजर आता है।

पप्पू यादव ने अपने बयान में पूछा कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देना चाहती थी, तो वर्ष 2014 और 2019 के कार्यकाल में महिला आरक्षण बिल को पारित क्यों नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण विधेयक को लंबे समय तक लंबित रखना यह दर्शाता है कि उस समय इसे लेकर कोई गंभीर इच्छाशक्ति नहीं थी।
उन्होंने आगे कहा कि अब जब सरकार इस मुद्दे को लेकर सक्रिय दिखाई दे रही है, तो इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके अनुसार, यह कदम कहीं न कहीं राजनीतिक लाभ हासिल करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।

इसके साथ ही पप्पू यादव ने डिलिमिटेशन (निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन) के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने सवाल किया कि 2014 और 2019 में इस प्रक्रिया को क्यों नहीं अपनाया गया और अब अचानक इसे प्राथमिकता क्यों दी जा रही है। उनका कहना है कि ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों को समय-समय पर टालना और फिर अचानक लागू करने की कोशिश करना पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।

पप्पू यादव ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने पहले इन विषयों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया और अब इन्हें राजनीतिक एजेंडे के तहत प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जनता को यह समझने की जरूरत है कि इन फैसलों के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या है—क्या यह जनहित में है या फिर राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम।
उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। आने वाले समय में महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन जैसे मुद्दों पर सियासी बयानबाजी और भी तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
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