ई-फार्मेसी विरोध: किशनगंज में बुधवार को दवा कारोबार से जुड़ा बड़ा विरोध देखने को मिला, जब ऑनलाइन दवा बिक्री के खिलाफ जिले के अधिकांश मेडिकल स्टोर एक दिन के लिए बंद रहे। यह बंद ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) और बिहार केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन के आह्वान पर किया गया। दवा कारोबारियों ने इसे अपनी आजीविका और पारंपरिक दवा व्यापार की रक्षा के लिए जरूरी कदम बताया।
यह हड़ताल देशभर में चल रहे ई-फार्मेसी के विस्तार और ऑनलाइन दवा बिक्री के बढ़ते प्रभाव के विरोध में की गई है। दवा विक्रेताओं का कहना है कि यदि इस व्यवस्था पर सख्त नियंत्रण नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में छोटे और मध्यम स्तर के मेडिकल स्टोर पूरी तरह प्रभावित हो जाएंगे।

क्यों किया गया बंद?
दवा विक्रेताओं का मुख्य आरोप है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बिना पर्याप्त निगरानी के दवाओं की बिक्री कर रहे हैं। उनका कहना है कि कई मामलों में बिना वैध डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन के भी दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जो मरीजों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।
किशनगंज दवा विक्रेता संघ के सचिव जंगी प्रसाद दास ने कहा कि ऑनलाइन दवा कारोबार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके लिए जो नियम और निगरानी होनी चाहिए, वह अभी पर्याप्त नहीं है। उन्होंने बताया कि छोटे दुकानदारों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और कई परिवारों की आजीविका पर संकट गहराता जा रहा है।
उनके अनुसार, “अगर इसी तरह ऑनलाइन दवा बिक्री को बढ़ावा मिलता रहा और स्थानीय दुकानदारों की अनदेखी की जाती रही, तो हजारों परिवारों का रोजगार खतरे में पड़ सकता है।”

ई-फार्मेसी पर गंभीर आरोप
दवा विक्रेताओं ने ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कुछ ऑनलाइन कंपनियां बिना डॉक्टर की पर्ची के भी दवाएं उपलब्ध करा रही हैं। यह स्थिति खासकर उन दवाओं के लिए अधिक खतरनाक मानी जा रही है, जो नशे या साइकोट्रॉपिक श्रेणी में आती हैं।
संघ का कहना है कि दवाएं केवल सामान्य उत्पाद नहीं हैं, बल्कि यह सीधे लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। इसलिए इनकी बिक्री पर सख्त निगरानी जरूरी है। दवा विक्रेताओं ने मांग की है कि सरकार ई-फार्मेसी के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नियम बनाए, ताकि मरीजों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो और व्यापारिक संतुलन भी बना रहे।

हड़ताल का असर आम लोगों पर
किशनगंज में इस बंद का सीधा असर आम जनता पर देखने को मिला। कई मेडिकल स्टोर बंद रहने के कारण मरीजों और उनके परिजनों को दवाओं के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
विशेष रूप से बुजुर्ग मरीज और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। कई परिजनों को जरूरी दवाएं समय पर नहीं मिल सकीं, जिससे अस्पतालों और मेडिकल स्टोरों के बाहर असहज स्थिति भी देखने को मिली।
लोगों ने बताया कि अचानक हुए बंद के कारण उन्हें दूर-दराज के इलाकों से दवाएं लाने में कठिनाई हुई। हालांकि कुछ जगहों पर अस्पतालों से जुड़े मेडिकल स्टोर खुले रहे, जिससे आंशिक राहत जरूर मिली।

आपातकालीन सेवाओं को रखा गया अलग
प्रशासन और दवा विक्रेता संघ के बीच समन्वय के बाद यह तय किया गया कि जिला मुख्यालय की पांच प्रमुख मेडिकल दुकानों को बंद से बाहर रखा जाएगा। इन दुकानों को विशेष रूप से आपातकालीन और जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए खुला रखा गया।
इस निर्णय का उद्देश्य यह था कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों और गंभीर स्थिति वाले लोगों को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। इन दुकानों के माध्यम से आवश्यक दवाओं की सप्लाई जारी रही।
छोटे दुकानदारों की चिंता
दवा कारोबारियों का कहना है कि ऑनलाइन फार्मेसी के कारण छोटे मेडिकल स्टोर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भारी छूट और डोर-टू-डोर डिलीवरी की सुविधा देकर ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं।
इस वजह से स्थानीय दुकानदारों का कारोबार लगातार घट रहा है। कई छोटे मेडिकल स्टोर संचालकों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो उन्हें अपना व्यवसाय बंद करने की नौबत आ सकती है।

सरकार से क्या मांग है?
दवा विक्रेताओं ने सरकार से मांग की है कि ई-फार्मेसी के संचालन के लिए सख्त नियम बनाए जाएं। उनका कहना है कि बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाओं की बिक्री पूरी तरह रोकी जानी चाहिए।
इसके अलावा उन्होंने यह भी मांग की है कि ऑनलाइन और ऑफलाइन दवा कारोबार के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि किसी भी वर्ग के व्यापारियों को नुकसान न हो और मरीजों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
आंदोलन की चेतावनी
दवा विक्रेताओं ने साफ चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया, तो आगे बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर अनिश्चितकालीन हड़ताल भी की जा सकती है।
संघ का मानना है कि यह लड़ाई केवल व्यापार की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा और रोजगार से भी जुड़ी हुई है। इसलिए इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
किशनगंज में हुआ यह एकदिवसीय बंद ई-फार्मेसी के खिलाफ बढ़ते असंतोष को दर्शाता है। जहां एक ओर दवा विक्रेता अपने व्यापार और सुरक्षा नियमों की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मरीजों को भी रोजमर्रा की दवाओं के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
अब देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है और क्या दवा कारोबारियों की मांगों का कोई समाधान निकल पाता है या नहीं।









